अब तक कितना स्वच्छ भारत
@iamshubham
2 अक्टूबर का दिन दो कारणों से बहुत ख़ास है, एक कि आज के दिन 1869 में देश ने एक ऐसे नेता को पाया जिसके नेतृत्व में देश आजादी के रंग में रंग गया और दूसरा कि आज का दिन स्वच्छ भारत अभियान के एक वर्ष पूरे हुए।
आज ये समझना ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है कि एक साल में इस अभियान पर करोड़ो रुपयों से भी ज्यादा फूंक कर सरकार देश में कितना बड़ा बदलाव कर पाई है। हालाँकि महात्मा गांधी ने सबसे पहले स्वच्छ भारत की परिकल्पना की थी, जिसके कारण भाजपा सरकार ने इसे बापू के जन्मदिन पर एक अभियान के तौर पर लोगों के बीच में उतारा।
आज एक साल बाद जब हम पूरे अभियान के लिए हुए काम काज़ पर नज़र फेरते हैं तो सरकार के कथनी और करनी में भयंकर अंतर दिखता है। इस अभियान का जितना प्रयोग भाषणों को सुन्दर बनाने के लिए होता है अगर उतनी ऊर्जा राजनेता इसके क्रियान्वयन में खर्च करते तो शायद कुछ तो अंतर दिखता।
इस योजना के विज्ञापनों पर सरकार एक साल में 94 करोड़ रुपयों से ज्यादा खर्च कर चुकी है। इस मेहनत का ही नतीज़ा है कि शहरों, गाँवों में साफ़ सुथरी और बड़ी बड़ी होर्डिंगें दिख जाती हैं।
इस अभियान की शुरुआत तो प्रधानमंत्री जी के झाड़ू उठाने से हुई पर गत् वर्ष में सरकार उन संसाधनों को लोगों तक पहुचाने में नाकाम रही जिससे अभियान को सार्थक बनाया जा सके। सार्वजनिक जगहों पर कचरे के डब्बों की उपलब्धता ना होने के वजह से व्यक्ति चाहते हुए भी कचरा सही जगह पर नहीं फेंक पाता है। शौचालय के लिए भी यही बात लागू होती है, नगरों के कुछ चुनिंदा इलाकों के अलावा बाकी क्षेत्रों में शौचालय उपलब्ध भी नहीं हैं। इस योजना का मुख्य उद्देश्य शहरी एवं ग्रामीण इलाकों में शौचालयों के निर्माण करना और साफ सफाई के प्रति लोगों को सजग करना है।
स्वच्छता की अवधारणा मात्र अपने आस पास की सफाई भर कर देने से नहीं पूरी हो सकती, क्योंकि अगर ऐसा ही होता तो चीन में संघाई समेत कई बड़े शहरों के निवासी उद्योग फैक्टरियों से हो रहे प्रदुषण से त्रस्त हो कर के पलायन को मजबूर नहीं होते। एक आदर्श स्वच्छ वातवरण की परिधि में धरातल के साथ साथ हमारे वायुमंडल और सभी जल के श्रोत जैसे नदियां और तालाब भी आते हैं। वातावरण में व्याप्त प्रदुषण के वजह से ही पर्यावरण निष्पादन सूचकांक-2014 में कुल 178 देशों के क्रम में भारत 155वें स्थान पर खड़ा है। देश की कई नदियां तो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है और कुछ तो नालों में तब्दील हो चुकी हैं। यही कारण है कि इस तरह की लापरवाही से मात्र मनुष्य नहीं बल्कि पंछी और जल जीवन पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है।
खैर इस अभियान के तहत 2019 तक देश भर में 1,96,009 करोड़ रूपये खर्च करेगी सरकार। यह देखना बहुत दिलचस्प होगा की तब तक कितना बदलाव हो पाता है। एक ऐसी ही योजना यूपीए के कार्यकाल में 'निर्मल भारत अभियान' के नाम से लागू किया गया था, पर वो थोड़े ही दिनों में फ्लॉप साबित हुआ। ऐसे में देश के स्वच्छ और सुन्दर भविष्य की कामना करते हुए हम यही प्रार्थना करेंगे कि यह योजना भविष्य में सफल हो।
एक और बात लोगों को भी समझनी चाहिए कि केवल सरकारी प्रयासों से इस अभियान को कभी सार्थक नहीं किया जा सकता है। देश की स्वच्छता के लिए सभी नागरिकों की ज़िम्मेदारी बराबर की है। यह वातावरण हमारे लिए है, ये देश हमारा है और इसके स्वच्छता का दायित्व सभी देशवासियो पर है। हमे स्वच्छता के प्रति सजग होना चाहिए जिससे हम बापू के स्वच्छ भारत के परिकल्पना को साकार रूप देने में अपना योगदान कर सके।
आज ये समझना ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है कि एक साल में इस अभियान पर करोड़ो रुपयों से भी ज्यादा फूंक कर सरकार देश में कितना बड़ा बदलाव कर पाई है। हालाँकि महात्मा गांधी ने सबसे पहले स्वच्छ भारत की परिकल्पना की थी, जिसके कारण भाजपा सरकार ने इसे बापू के जन्मदिन पर एक अभियान के तौर पर लोगों के बीच में उतारा।
आज एक साल बाद जब हम पूरे अभियान के लिए हुए काम काज़ पर नज़र फेरते हैं तो सरकार के कथनी और करनी में भयंकर अंतर दिखता है। इस अभियान का जितना प्रयोग भाषणों को सुन्दर बनाने के लिए होता है अगर उतनी ऊर्जा राजनेता इसके क्रियान्वयन में खर्च करते तो शायद कुछ तो अंतर दिखता।
इस योजना के विज्ञापनों पर सरकार एक साल में 94 करोड़ रुपयों से ज्यादा खर्च कर चुकी है। इस मेहनत का ही नतीज़ा है कि शहरों, गाँवों में साफ़ सुथरी और बड़ी बड़ी होर्डिंगें दिख जाती हैं।
इस अभियान की शुरुआत तो प्रधानमंत्री जी के झाड़ू उठाने से हुई पर गत् वर्ष में सरकार उन संसाधनों को लोगों तक पहुचाने में नाकाम रही जिससे अभियान को सार्थक बनाया जा सके। सार्वजनिक जगहों पर कचरे के डब्बों की उपलब्धता ना होने के वजह से व्यक्ति चाहते हुए भी कचरा सही जगह पर नहीं फेंक पाता है। शौचालय के लिए भी यही बात लागू होती है, नगरों के कुछ चुनिंदा इलाकों के अलावा बाकी क्षेत्रों में शौचालय उपलब्ध भी नहीं हैं। इस योजना का मुख्य उद्देश्य शहरी एवं ग्रामीण इलाकों में शौचालयों के निर्माण करना और साफ सफाई के प्रति लोगों को सजग करना है।
स्वच्छता की अवधारणा मात्र अपने आस पास की सफाई भर कर देने से नहीं पूरी हो सकती, क्योंकि अगर ऐसा ही होता तो चीन में संघाई समेत कई बड़े शहरों के निवासी उद्योग फैक्टरियों से हो रहे प्रदुषण से त्रस्त हो कर के पलायन को मजबूर नहीं होते। एक आदर्श स्वच्छ वातवरण की परिधि में धरातल के साथ साथ हमारे वायुमंडल और सभी जल के श्रोत जैसे नदियां और तालाब भी आते हैं। वातावरण में व्याप्त प्रदुषण के वजह से ही पर्यावरण निष्पादन सूचकांक-2014 में कुल 178 देशों के क्रम में भारत 155वें स्थान पर खड़ा है। देश की कई नदियां तो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है और कुछ तो नालों में तब्दील हो चुकी हैं। यही कारण है कि इस तरह की लापरवाही से मात्र मनुष्य नहीं बल्कि पंछी और जल जीवन पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है।
खैर इस अभियान के तहत 2019 तक देश भर में 1,96,009 करोड़ रूपये खर्च करेगी सरकार। यह देखना बहुत दिलचस्प होगा की तब तक कितना बदलाव हो पाता है। एक ऐसी ही योजना यूपीए के कार्यकाल में 'निर्मल भारत अभियान' के नाम से लागू किया गया था, पर वो थोड़े ही दिनों में फ्लॉप साबित हुआ। ऐसे में देश के स्वच्छ और सुन्दर भविष्य की कामना करते हुए हम यही प्रार्थना करेंगे कि यह योजना भविष्य में सफल हो।
एक और बात लोगों को भी समझनी चाहिए कि केवल सरकारी प्रयासों से इस अभियान को कभी सार्थक नहीं किया जा सकता है। देश की स्वच्छता के लिए सभी नागरिकों की ज़िम्मेदारी बराबर की है। यह वातावरण हमारे लिए है, ये देश हमारा है और इसके स्वच्छता का दायित्व सभी देशवासियो पर है। हमे स्वच्छता के प्रति सजग होना चाहिए जिससे हम बापू के स्वच्छ भारत के परिकल्पना को साकार रूप देने में अपना योगदान कर सके।
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Reviewed by Kehna Zaroori Hai
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14:04
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