धर्म के नाम पर अधर्म
लोग कहते हैं 'मन में सच्ची श्रद्धा और
भक्ति भावना हो तो ईश्वर स्वयं आ कर अपने
भक्त को दर्शन देते हैं।' पर आज के मनुष्य की भोग
विलास, सांसारिक महत्वाकांक्षा और
दूसरों की निजी जीवन में
अपनी सक्रियता दर्ज कराने के बाद
कितनी श्रद्धा बचती है इस बात पर प्रश्न
चिन्ह इस लिए भी उठता क्योंकि प्रभु
को प्रत्यक्ष रूप से अपनी प्रतिछाया उतारे
भी युग बीत गए और वैसे श्रद्धावान भक्त
भी विरलय ही दिखते हैं। पर भक्त भी कम
जिद्दी नही होते हैं वो भी मन ही मन ठान
लेते हैं कि, 'प्रभु हमें दर्शन नहीं दे रहे तो क्या,
हम खुद ईश्वर की चैखट तक जाएंगे।'
खैर ये तो एक भक्त और भगवान के मन में चल रहे
द्वंद्व का अंश था, अब कुछ व्यावहारिक
बातों पर आते हैं। हम हाल में ही महाकाल
की पावन भूमि उज्जैन महाकालेश्वर
ज्योतिर्लिंग दर्शन के लिए गए थे। मंदिर
प्रांगण में कुछ विचलित करने वाले अनुचित
दृश्यों का नज़ारा मिला। वहाँ लगे होर्डिंग्स
और बैनर इस बात की गवाही दे रहे थे कि मंदिर
जैसे पवित्र स्थल जहां ईश्वर की प्रभा, शीतल
छाया, कृपा-रस जैसे अनेकानेक
दैवीयता का इन्द्रिय-बोध होता है,
जहाँ मनुष्य सारे सांसारिक श्रेणियों,
वगृिकरण के सभी मापदंडों से अलग हो कर ईश
भक्त की एकमात्र श्रेणी में आ जाते हैं,
वहाँ भी धनवान, पूँजीवाद और औद्योगिक
घरानों का प्रभाव पड़ने लगा है।
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन के दो द्वार
हैं, पहला धर्म द्वार जिसमें सुबह से
लोगों का हूजुम एक पंक्ति में सिमट कर करीब
4-5 घंटों के मशक्कत के बाद मंडप तक पहुँचता है
और मंडप में मात्र इतना ही समय होता है
कि आप आधी परिक्रमा कर सकें (दरअसल
परिक्रमा का रास्ता अंदर आए हुए द्वार से
बाहर निकलने वाले द्वार तक का है) और हाथ
जोड़ लें क्योंकि इतने में वहां खड़े संतो, साधुओं
और पंडों का झुंड आपको बाहर निकालने के
लिए बेताब हो उठते हैं। वही दूसरा द्वार VIP
द्वार है, जहाँ आपको मात्र 150 रुपये
की धनराशि देनी होती है और फिर 2 मिनट
के कठिन परिश्रम के बाद (यह 2 मिनट
का कठिन परिश्रम पैदल चलना होता है) आप
ज्योतिर्लिंग के दर्शन का लाभ उठा सकते हैं,
फिर यह आपकी इच्छाशक्ति पर निर्भर
करता है कि आप खुद को कब तक प्रभु के सामने
रखते हैं या आपके मनोकामना की लिस्ट
कितनी लंबी है।
सवाल सिर्फ 150 रुपयों का नहीं है, आप सोचें
समाज में आर्थिक स्थिति को मापदंड मान कर
आपसे कैसा व्यवहार किया जाए इस बात
का निर्धारण होता है, पर ईश्वर के घर में इस
तरह का दोमुहा व्यवहार निंदा योग्य है। हम
सब ईश्वर के संतान हैं, जिस प्रकार ईश्वर अपने
बच्चों के बीच कोई भेद नहीं करता उसी प्रकार
धार्मिक स्थल, संस्थाओं को भी इस तरह के भेद
को खत्म कर सामाजिक
समरसता का उदाहरण विश्व के सामने
रखना चाहिए।
धर्म के नाम पर अधर्म
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